रजनीकुमार पंड्या

Shri Rajnikumar Pandya on cover of one of his books

Shri Rajnikumar Pandya on cover of one of his books

कलम के करिश्मेकार

जन्म तिथि ६-७-१९३८ जन्मस्थल : जेतपुर (सौराष्ट्र-गुजरात)

शिक्षा : बी कॉम., बी. ए. सम्प्रति : पूर्णकालीन पत्रकार

व्यक्तित्व : सौराष्ट्र की धरा अपनी वीरता और शौर्य से छलकती तो रही ही है साथ ही साहित्य और कला में भी अपना सानी यहीं रखती. ऐसी धरा में पैदा हुए और उसी की मिटटी में खेले-कूदे परवरिश पाते रहे राजनीकुमार गुजराती भाषा के सशक्त कथाकार हैं. वैसे उनके कर्मजीवन का आरम्भ तो बैंक की नौकरी से हुआ जहाँ शुष्क अंकों और हिसाबों से उनका पाला पड़ा लेकिन उनके भीतर एक सशक्त सर्जक तो कॉलेज काल से पैदा हो चुका था. कॉलेज काल में उनकी लिखी कहानियां न सिर्फ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होतीं बल्कि गुजरात एवं मुंबई में पुरस्कृत होने लगी थीं. १९६० में मुंबई की मशहूर पत्रिका ‘गुंजन’ कहानी स्पर्धा में उन्हें प्रथम पारितोषिक मिला जिसने लोगों को उनमे पड़े सर्जक से प्रति ध्यान आकर्षित करने के लिए मजबूर किया. इसी तरह मुंबई की ही ‘सविता’ पत्रिका में लगातार तीन बार उनकी कहानी को प्रथम पारितोषिक के साथ स्वर्णपदक भी प्राप्त हुआ जिसका समारोह आयोजकों ने इस अनोखे कहानीकार के मादरे वतन में जाकर किया. तब से लेकर आज तक इस कलम के करिश्मेकार की सर्जक-यात्रा अविरत चालू रही है.

हालांकि बैंक की नौकरी और बार-बार होते तबादलों ने बीच में उनकी सर्जक प्रतिभा को आगे बढ़ने में कई बाधाएं पैदा कीं. दस-पंद्रह साल  तक गति अपेक्षाकृत धीमी रही, लेकिन भीतर का साहित्यकार भला कैसे शांत रह पाता ? अन्दर बैठे-बैठे वह इतना  सशक्त और पुष्ट होता रहा कि  १९८० सा बाद वह बाहर निकलने के लिए बेत्ताब हो उठा. तब उन्हें इसी दौरान गुजरात के सुप्रसिद्ध दैनिकपत्र ‘सन्देश’ में नियमित रूप से लेख-श्रृंखला लिखने का आमंत्रण मिला जिसे उन्होंने कुछ उलझन के साथ स्वीकार कर लिया. उनके जीवन में आया हुआ यह हसीं मोड़ उनके भीतर छिपे साहित्यकार को न सिर्फ़ गिने-चुने पाठकों तक, बल्कि आम आदमी के दिलों में अनोका स्थान बनाते हुए साहित्यकार एवं समाजसेवी के ऊंचाइयों तक पहुँचाने के लिए निमित्त बन गया. उनकी लेख-श्रंखला ‘झबकार’ में इस सफल सर्जक एवं मूलतः कथाकार कि लेखनी ने ‘रेखाचित्र’ जैसी विधा में हकीकतों – सच्चाइयों के साथ कथात्मकता का इतना रोचक गुम्फन किया कि वे अपनी मिसाल आप बन गए. सफल रेखा चित्रकार  के साथ-साथ इस श्रृंखला के अर्न्तगत प्रकाशित होती रचनाओं में वे एक और मनोविश्लेषक की भूमिका निभाते हरे तो दूसरी और कई समाजसेवी शिक्षा  संस्थाओं के विकास की अपनी लेखनी की द्बारा बुनियादी नींव बने. ऐसी संस्थाओं की महक श्री पंड्या जी के करिश्मे की ज़िन्दा मिसालें हैं. शायद ही किसी साहित्यकार ने इस प्रकार की सफलता पायी हो.

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Shri Pandyaji

Shri Pandyaji

ऐसे अनोखे रचनाकार मूलतः तो कहानीकार या कथाकार ही हैं. अपनी साहित्याधार्मिता  में  पथबाधा बनती बैंक की नौकरी को अंततोगत्वा १९८९ में अलविदा कर कलम और साहित्य को ही पूर्णतयः समर्पित हो गए. इसके बाद आज तक उन्होंने पीछे मुड़ कर देखा ही नहीं है. साहित्य की सभी विधाओं (कविता को छोड़) में उनकी लेखनी ने ऐसा कमाल दिखाया की न सिर्फ देह में बल्कि विदेशों में भी वे छाये हुए हैं.

वैसे तो इस अनोखे कथाकार ने छः उपन्यास और कई कहानियाँ लिखीं हैं पर उनके दो उपन्यासों ने दृश्य-श्रब्य माध्यमों के निर्माता-निर्देशकों को चकाचौंध कर दिया. “कुंती” (खंड १-२) एक सत्य घटना के छोटे से कथा-बीज को लेकर लिखा गया ऐसा उपन्यास है जिसकी आज तक तीन आवृत्तियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं. इतना ही नहीं, पहले १३ हफ्तों का धारावाहिक सीरियल दूरदर्शन के लिए इसी कथा पर आधारित बना अकुर अब उसी उपन्यास पर आधारित २५० हफ्तों का धारावाहिक टी. वी. सीरियलों के यशश्वी निर्माता – निर्देशक अधिकारी ब्रदर्स ने तैयार किया जो २० मई २००२ से डी.डी. मेट्रो चैनल से दैनिक धारावाहिक के रूप में प्रसारित होता है. सिर्फ गुजराती साहित्य के लिए नहीं बल्कि अन्य भाषा के उपन्यासकारों की तुलना में उन्हें प्राप्त सफलता अपना सानी नहीं रखती. इसके लिए उन्हें पांच लाख रुपये मिले हैं. अब यही उपन्यास बहुत जल्द हिंदी में अनूदित होकर प्रकाशित हो रहा है.

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मूलतः तो कहानीकार या कथाकार

मूलतः तो कहानीकार या कथाकार

 

जारी…….

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